Tuesday, September 15, 2015

wibhajan ke baad shasan- ek dushtachakra

एकला चलो रे ..

पिछले कुछ दिनों से, एक घुटन सी महसूस हो रही है. शायद इसकी वजह फेसबुक पर चल रही कुछ बहसें. सोचता हूं, की अज्ञान रहने में ही सुख है. प्रचार करने वाले लोगों को देखकर यह सोचता हूं की, इन्हें तो फायदा होगा, लेकिन मुझे या मेरे परिवार के नुक्सान के बाद ही.

विभाजन के बाद शासन, यह राजनीति का एक अंग, अंग्रेज यहाँ छोड़ गए और यहाँ वह पल कर अपनी जड़ें मजबूत कर रही है. अनेक झुण्ड बन गए और हर झुण्ड को बस अपनी ही पड़ी है. (बात केवल धर्म पर सीमित नहीं रही.)

आरक्षण की व्यवस्था जब तय हुई, तो यह केवल दस साल तक नियंत्रित थी. उसके बाद तो समान कायदा लागु होना था. लेकिन...

किसी भी विषय के कारण, आरक्षण जिस काल से चालू किया जाता है, तभीसे सर्व “नेता” अपने अपने गट अलग करने पर टल जाते हैं, कुछ चंद वोटों के लिए. (और यह संसर्ग हमेशा के लिए चालू हो जाता है.).

कुछ चंद नेताओं के फायदे के लिए देश का विभाजन करने लायक परिस्थिति बनाई गई. एक देश स्वतंत्र नहीं हुआ, बल्कि दो देश विभाजित हुए. विभाजन के बाद गठबंधन बहुत ही मुश्किल है. विभाजन करनेवालों की नीति कितनी गिरी होगी, जो इंसान को इंसान से अलग करने पर तुली हो.

विभाजित रहने के लिए जो कूटनीति इस्तेमाल की जाती है, उसमे लाभ केवल नेताओं (और उनके चमचों) का है. अगर, हर सामान्य व्यक्ति एक दुसरे के साथ जुल मिल जाती है, तो नेता को प्रचार के लिए कोई भी साधन नहीं मिलता. सामान्य इंसान अपने फायदे की सोचता है. ज्यादा कष्ट बिना काम कैसे हो जावे. वह उस गुट का सदस्य बन जाता है. उसकी निष्ठा उसके गुट से बंध जाती है.. हमेशा के लिए.
(शायद वो अपनी गहरी नींद से जग जाता है, तब, जब उसके पल्ले कुछ नहीं आता.) ऐसे अनेक खाली हाथ लोगों के लिए एक नया नेता हमेशा उगता है. :)

आत्मविश्वास की कमी के कारण, कोई भी इंसान अपने गट से अलग विचार करने का प्रयत्न नहीं करता. उसका खुद का अस्तित्व गुट से जुड़ जाता है और वह और कमजोर होता जाता है. लेकिन, जब वह खुद अपनी दृष्टि से विचार कर पाएगा, तब संसार में वह सबसे सर्वसम्पन्न व शक्तिशाली होगा. उसे किसी गुट का भय न रहेगा. वह दुसरे इंसान के साथ एक इंसान की तरह बर्ताव कर सकेगा.

यह झुण्ड अथवा गुट व सम्प्रदाय एकता की भाषा करते हैं किंतु एक जगत की नहीं. दूसरों से अलग करने के लिए अपने झुण्ड की एकता का विचार. यह खयाल भेडियों से एक कतरा भी अलग नहीं. भेडिये पेट भर की शिकार कर चुप हो जाते हैं.

देखता हूं, की हर दिन कुछ नए सम्प्रदाय बन रहे हैं. एक दुसरे से भिड रहे हैं.
एकता की बात तब होती है जब बाहरी झुण्ड से खतरा बढ़ जाता है. उस झुण्ड को उकसानेवाला खयाल में ही नहीं आता.

इस सभी से अलिप्त रहने के लिए केवल एक ही मार्ग बचता है.
हिम्मत न हारो पर एकला चलो रे..

तभी विचार अपना खुद का होगा!

-पराग